ईचागढ़ जन समस्या घिरे संसद संजय सेठ।
चांडिल, ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में फिर बना हाथी-मानव संघर्ष का रणक्षेत्र, 2 महीने में 5 मौतें।
टॉर्च-पटाखे के लिए तरस रहे पीड़ित, 'फॉरेस्ट PR' कागजों तक सीमित ,- पूछता है इचागढ़।
अवैध खनन से बिगड़ा जंगल, बलि का बकरा बन रहा वनरक्षी।
चांडिल :ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र एक बार फिर हाथी समस्या और मानव-हाथी संघर्ष की आग में झुलस रहा है। पिछले दो महीने के भीतर हाथी के हमले में 5 लोगों की मौत हो चुकी है। मौत, घरों का टूटना और राहत के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति - यही आज ईचागढ़ की सच्चाई बन गई है।
एक दिन में 11 घर ध्वस्त, राहत के नाम पर 2 टॉर्च-2 पटाखे।
मौसाडा कालीचमदा स्वर्णरेखा परियोजना द्वारा विस्थापित क्षेत्र में हाथियों के झुंड ने एक ही दिन में 11 घरों को तहस-नहस कर दिया। घटना के तुरंत बाद वनरक्षी द्वारा राहत सामग्री के तौर पर लाइट और पटाखों का वितरण किया गया। लेकिन विस्थापित नेता राकेश रंजन ने फेसबुक पोस्ट पर कमेंट किया - "सिर्फ दो टॉर्च और दो पटाखे दिए गए।
तहकीकात में खुली पोल: फाइलों में फंसी राहत।
इस कमेंट को संज्ञान में लेते हुए जब मामले की तहकीकात की गई तो सच्चाई सामने आई। विभाग द्वारा टॉर्च लाइट और पटाखों का वितरण यथावत किया गया है। लेकिन सभी प्रभारी वनपाल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में चले जाने से स्थानीय वनरक्षी को तत्काल राहत सामग्री का भुगतान नहीं किया जा रहा है। नतीजा - वनरक्षी के पास सामान है, लेकिन देने का अधिकार नहीं। और इसी कारण उन्हें हाथी प्रभावित क्षेत्र के लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है।
दुर्भाग्य यह है कि किसी बड़ी घटना के समय गुस्साए ग्रामीणों का सामना अकेले वनरक्षी को ही करना पड़ रहा है। फॉरेस्ट पब्लिक रिलेशनशिप जमीन पर साकार होता नहीं दिख रहा।
अवैध खन से बढ़ रही हाथी समस्या, वनरक्षी पर टूट रहा गुस्सा।
एक ओर अवैध खन माफियाओं द्वारा लगातार खनिज संसाधनों का दोहन किया जा रहा है, जिससे जंगल उजड़ रहा है और हाथी समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर मानव-हाथी संघर्ष में किसी प्रकार की दुर्घटना होने के बाद भी अगर स्थानीय वनरक्षी प्रभावित क्षेत्र में तत्काल उचित राहत सामग्री मुहैया कराने में सफल नहीं होते हैं, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी उन्हीं पर डाल दी जाती है।
बलि का बकरा बना वनरक्षी, जिम्मेदारी सबकी।
जबकि चांडिल फॉरेस्ट डिपार्टमेंट एक टीम वर्क पर काम करती है। उस टीम वर्क के तहत स्थानीय वनरक्षी के अलावा वनपाल, वन क्षेत्र पदाधिकारी, वन प्रमंडल पदाधिकारी - सभी की समान जवाबदेही होती है। लेकिन हकीकत में बलि का बकरा सिर्फ वनरक्षी को ही बनाया जा रहा है। ऊपर से अवैध खन माफिया भी अपने हित साधने के लिए वनरक्षी पर दबाव बना रहे हैं। आखिर समाधान क्या है? पूछता है इचागढ़।
2 महीने में 5 लाशें, एक दिन में 11 घर तबाह, और राहत के नाम पर प्रशिक्षण के चक्कर में अटकी टॉर्च-पटाखे। अवैध खन से उजड़ता जंगल और जवाबदेही से मुकर रहे कर्मी।
ऐसे में आखिर हाथी समस्या और मानव-हाथी संघर्ष का समाधान कैसे होगा? कब तक वनरक्षी ही लोगों के गुस्से का शिकार बनते रहेंगे? कब तक कागजों पर पारित योजनाएं और राहत सामग्री फाइलों में ही दम तोड़ती रहेंगी?
ईचागढ़ के लोग आज यही पूछ रहे हैं - मौतों का आंकड़ा कब रुकेगा और सिस्टम कब जागेगा?


0 Comments