पुनर्वास स्थलों पर आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव, ।

पुनर्वास स्थलों पर आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव, ।जमीन के पट्टे की मांग तेज।
संवाद यात्रा के तीसरे दिन में रूयानी, पियालडीह, हाथीनादा, रामायगड़ा, रसुनिया गाँव, सुकसारी पुनर्वास, काटिया पुनर्वास होते हुए तारकुआँग पुनर्वास स्थल तक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।
चांडिल डैम विस्थापित समन्वय मंच की संवाद यात्रा में सामने आईं पुनर्वास स्थलों की जमीनी समस्याएं

पुनर्वास स्थलों पर आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव, जमीन के पट्टे की मांग तेज

सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ भू-स्वामित्व का अधिकार देने की मांग

सरायकेला खरसावां जिला के चांडिल डैम विस्थापित समन्वय मंच के बैनर तले 116 विस्थापित गांवों एवं 13 पुनर्वास स्थलों में चल रही संवाद यात्रा के दूसरे चरण के तीसरे दिन बुधवार को रूयानी, पियालडीह, हाथीनादा, रामायगड़ा, रसुनिया गाँव, सुकसारी पुनर्वास, काटिया पुनर्वास होते हुए तारकुआँग पुनर्वास स्थल तक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।

आज की संवाद यात्रा में मंच ने विशेष रूप से पुनर्वास स्थलों की वर्तमान स्थिति और वहां रह रहे विस्थापित परिवारों की रोजमर्रा की समस्याओं पर चर्चा की। ग्रामीणों ने बताया कि वर्षों पूर्व विस्थापित होने के बावजूद कई पुनर्वास स्थलों पर आज भी सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, पुनर्वास स्थलों पर बसे परिवारों के सामने जमीन के पट्टे और भू-स्वामित्व से जुड़े अधिकार का मुद्दा भी गंभीर बना हुआ है। ग्रामीणों ने पुनर्वास स्थलों के आसपास बाहरी लोगों द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण, अवैध कब्जे तथा श्मशान घाटों पर अवैध कब्जे की शिकायत भी मंच के समक्ष रखी। उन्होंने मांग की कि ऐसे अतिक्रमण और अवैध कब्जों की तत्काल जांच कर उन्हें हटाया जाए तथा श्मशान घाटों और सामुदायिक उपयोग की जमीनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

मंच के सदस्य अंजित किस्कू एवं आकलू धीवर ने संयुक्त रूप से कहा कि पुनर्वास स्थलों को केवल बसाने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सरकार को वहां रहने वाले विस्थापित परिवारों को सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।

मंच ने मांग की कि पुनर्वास स्थलों पर सड़क, बिजली, शुद्ध पेयजल, स्वास्थ्य केंद्र तथा शिक्षा की समुचित व्यवस्था यथाशीघ्र सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही पुनर्वास स्थल में बसे परिवारों को उनकी जमीन का कानूनी पट्टा/भू-स्वामित्व अधिकार दिया जाए, ताकि वे अपने नाम से आवश्यक भूमि संबंधी दस्तावेज, जाति, आवासीय एवं अन्य प्रमाण पत्र बनवा सकें और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में आ रही परेशानियों से मुक्त हो सकें। मंच ने यह भी मांग की कि पुनर्वास स्थलों, श्मशान घाटों और अन्य सार्वजनिक जमीनों का सीमांकन कर अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

वर्षों बाद भी पुनर्वास का सवाल अधूरा

मंच के सदस्यों ने कहा कि चांडिल डैम के कारण विस्थापित हुए परिवारों ने विकास परियोजना के लिए अपनी जमीन और घर छोड़े, लेकिन कई परिवार आज भी पुनर्वास की मूलभूत सुविधाओं और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। संवाद यात्रा के दौरान सामने आ रही समस्याएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या पुनर्वास केवल जमीन से हटाकर दूसरी जगह बसाने का नाम है, या विस्थापित परिवारों को सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देना भी सरकार की जिम्मेदारी है?

मंच ने कहा कि संवाद यात्रा का उद्देश्य 116 गाँव तथा 13 पुनर्वास स्थलों की वास्तविक स्थिति को समझना और ग्रामीणों की समस्याओं को सामूहिक रूप से सामने लाना है। गांव-गांव और पुनर्वास स्थल-स्थल से प्राप्त समस्याओं को संकलित कर आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।

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