“पुनर्वास के नाम पर विस्थापितों को मिला नरक जैसा जीवन, मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष जारी”
चांडिल, 10 सितंबर 2026। चांडिल डैम विस्थापित समन्वय मंच के बैनर तले 116 विस्थापित गांवों एवं 13 पुनर्वास स्थलों को लेकर चल रही संवाद यात्रा के दूसरे चरण के चौथे दिन गुरुवार को कपाली ए, कपाली बी, कांदरबेड़ा पुनर्वास, चिलगू पुनर्वास, गांगुडीह पुनर्वास, केसरगाड़िया, डिमुडीह, बोराबिंदा होते हुए चावलीवासा पुनर्वास स्थल तक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।
संवाद यात्रा के दौरान विस्थापितों ने पुनर्वास स्थलों की बदहाल स्थिति, सरकारी सुविधाओं की कमी तथा पुनर्वास के लिए निर्धारित जमीन पर कथित अवैध कब्जे की गंभीर शिकायतें मंच के समक्ष रखीं। विस्थापितों का आरोप है कि कई पुनर्वास स्थलों पर बाहरी लोगों द्वारा जमीन पर कब्जा कर लिया गया है। इतना ही नहीं, कई जगहों पर खेल मैदान, श्मशान घाट, कब्रिस्तान तथा सामुदायिक उपयोग की जमीन भी अतिक्रमण की चपेट में है।
विस्थापितों ने बताया कि वर्षों पहले जिन जमीनों को पुनर्वास के उद्देश्य से चिह्नित किया गया था, उनमें से बड़ी संख्या में जमीन आज भी वास्तविक विस्थापित परिवारों के कब्जे में नहीं है। इसके कारण कई विस्थापित परिवार आज भी अपने पुनर्वास और जमीन के अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
कपाली में महज 30-32 लोगों को ही मिला पर्चा!
मंच के सदस्य राकेश रंजन महतो, श्यामल मार्डी एवं जरासिंधू गोप ने संयुक्त रूप से कहा कि चांडिल डैम के कारण अपना घर-जमीन गंवाने वाले विस्थापितों को पुनर्वास के नाम पर वर्षों से सिर्फ आश्वासन मिलता रहा है।
उन्होंने कहा कि कपालीAB पुनर्वास क्षेत्र में कथित तौर पर मात्र 30-32 लोगों को ही विभाग की ओर से पर्चा दिया गया है, जबकि बड़ी संख्या में विस्थापित परिवार आज भी अपने अधिकार से वंचित हैं। पुनर्वास की जमीन पर अवैध कब्जा हटाने के लिए विस्थापितों द्वारा बार-बार संबंधित विभाग एवं प्रशासन को आवेदन दिया गया, लेकिन समस्या का समाधान करने के बजाय उन्हें वर्षों से एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय का चक्कर लगवाया जा रहा है।
मंच के सदस्यों ने कहा कि यह स्थिति विस्थापितों के साथ न्याय नहीं बल्कि उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। जिस जमीन के लिए विस्थापितों ने अपनी पुश्तैनी जमीन, घर, खेत और सामाजिक पहचान तक खो दी, उसी पुनर्वास भूमि पर उनका अधिकार सुनिश्चित नहीं होना गंभीर प्रशासनिक विफलता है।
पहाड़ पर घर बनाकर रहने को मजबूर विस्थापित
विस्थापितों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि पुनर्वास की जमीन नहीं मिलने के कारण कई परिवार आज भी पहाड़ और दुर्गम इलाकों में अपने स्तर से घर बनाकर रहने को मजबूर हैं। न पर्याप्त सड़क, न पेयजल, न नाली, न स्वास्थ्य सुविधा और न ही बच्चों के लिए पर्याप्त शैक्षणिक एवं खेल सुविधाएं—कई पुनर्वास स्थल आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
मंच ने कहा कि पुनर्वास सिर्फ जमीन का पर्चा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। विस्थापित परिवारों को सम्मानजनक जीवन, सड़क, बिजली, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामुदायिक स्थल, खेल मैदान, श्मशान घाट एवं कब्रिस्तान जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।
“संवाद यात्रा के बाद बनेगी आंदोलन की ठोस रणनीति”
मंच ने प्रशासन से मांग की कि सभी पुनर्वास स्थलों की निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच कराकर जमीन का सीमांकन कराया जाए, अवैध कब्जे की जांच हो, सार्वजनिक एवं सामुदायिक उपयोग की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए तथा वास्तविक विस्थापितों को उनका वैधानिक अधिकार दिलाया जाए।
मंच ने कहा कि वर्षों से लंबित पुनर्वास और विस्थापन की समस्याओं को अब फाइलों में दबाकर नहीं रखा जा सकता। विस्थापितों के धैर्य की परीक्षा लंबे समय से ली जा रही है; अब संवाद के साथ समाधान की स्पष्ट समयसीमा भी तय करनी होगी।
संवाद यात्रा में राकेश रंजन महतो, अंबिका यादव, श्यामल मार्डी, अंजित किस्कू, सब्बीर अंसारी, कालू अंसारी, जरासिंधू गोप, एमडी समसुद्दीन, एसके अलाउद्दीन, एमडी शमीम, एमडी ताजुद्दीन, देवनारायण महली सहित बड़ी संख्या में विस्थापित ग्रामीण उपस्थित रहे।

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