दलमा में प्रशिक्षण-कार्यक्रम के बाद बवाल ,ग्रामीणों ने विकास के खर्च पर मांगा हिसाब।

दलमा में प्रशिक्षण-कार्यक्रम के बाद बवाल ,ग्रामीणों ने विकास के खर्च पर मांगा हिसाब।







चांडिल : झारखंड प्रदेश सरायकेला खरसावां जिला के चांडिल अनुमंडल अंतर्गत दलमा क्षेत्र में झारखंड के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के तहत ईको विकास समिति के कुछ अध्यक्ष को प्रशिक्षण दिया गया।इस अवसर पर दलमा वन क्षेत्र के प्रभारी रेंजर दिनेश चंद्रा ने कहा कि “कुछ विकास-विरोधी लोग बाधा डाल रहे हैं।” इस टिप्पणी से स्थानीय ग्रामीणों में नाराज़गी फैल गई और उन्होंने विभाग से कई सीधे सवाल पूछे। ग्रामीणों के मुख्य सवाल
ईको-टूरिज्म, “रन फॉर गजराज”, “बर्ड फेस्टिवल” जैसी योजनाओं में आने वाले लाखों-करोड़ों के फंड का ब्योरा क्या है..? प्रति वर्ष कितना मिला, कहाँ खर्च हुआ—सार्वजनिक रिपोर्ट क्यों नहीं..?135 गाँवों में ऐसी किसी योजना को लागू करने से पहले ग्राम सभा और ईको विकास समिति के साथ खुली बैठक क्यों नहीं होती..? जन-सलाह और सहमति को दरकिनार कर “विरोधी” का टैग लगाना उचित नहीं।ग्रामीणों की माँग है कि विभाग बिना अपमानजनक लेबलिंग के, खर्च-आउटरीच का खुला ऑडिट प्रस्तुत करे और आगे की योजनाओं में पंचायत-स्तरीय भागीदारी सुनिश्चित करे; तभी “विकास” का दावा भरोसेमंद माना जाएगा।
दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच कोल्हान के सुखलाल पहाड़िया केंद्रीय सचिव दलमा एंब सत्यनारायण मुर्मू केंद्रीय सह सचिव द्वारा संयुक्त रूप से कहा कि इस बयान के बाद दलमा क्षेत्र के ग्रामीणों में भारी नाराज़गी देखी जा रही है और कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यदि वास्तव में दलमा क्षेत्र में विकास हो रहा है, तो वन विभाग को इन सवालों का सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए। ग्रामीणों का पहला सवाल यह है कि जब ईको टूरिज्म, “रन फॉर गजराज”, “बर्ड फेस्टिवल” और अन्य योजनाओं के लिए सरकार से लाखों-करोड़ों रुपये का फंड आता है, तो उन योजनाओं को लागू करने से पहले दलमा क्षेत्र के 135 गांवों की ग्राम सभा और ईको विकास समिति के साथ खुली बैठक क्यों नहीं की जाती? इन योजनाओं में पारदर्शिता क्यों नहीं रखी जाती, जबकि इनका सीधा संबंध स्थानीय जंगल, वन्यजीव और गांवों से है। आरोप है कि जब किसी योजना का उद्घाटन होता है और मंत्री-विधायक आकर फीता काटते हैं, तब स्थानीय ग्रामीणों और ईको विकास समिति के अध्यक्षों को तक नहीं बुलाया जाता। ऐसे में सवाल उठता है कि जिन गांवों के नाम पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, उन्हें ही क्यों दरकिनार किया जा रहा है।सबसे बड़ा सवाल वन विभाग के उस बयान पर उठ रहा है जिसमें कहा गया कि कुछ लोग “विकास विरोधी” हैं और जहां-जहां विकास विरोधी लोग हैं वहां-वहां विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है। ग्रामीणों ने वन विभाग से मांग की है कि विकास विरोधी बताए गए लोगों के नाम सार्वजनिक किए जाएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आखिर किसे बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग ने सच में विकास कार्य किए हैं, तो अपने पूरे कार्यकाल में हुए सभी विकास कार्यों का पूरा हिसाब-किताब और खर्च का विवरण दलमा क्षेत्र के 135 गांवों की ग्राम सभा और ईको विकास समिति के सामने सार्वजनिक क्यों नहीं रखा जाता।इसके साथ ही ग्रामीणों ने दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी एंब गज परियोजना सेंचुरी के तराई क्षेत्र में लंबे समय से चल रही कई गतिविधियों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इलाके में अवैध खनन, होटल, वेयरहाउस, ट्रांसपोर्ट कंपनियों का संचालन और अन्य कई अवैध गतिविधियां लंबे समय से चल रही हैं, लेकिन इन सब पर वन विभाग और प्रशासन की चुप्पी समझ से परे है।ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि वन विभाग स्पष्ट करे कि दलमा क्षेत्र में अब तक,कितने फुटबॉल मैदान बनाए गए,
कितने सोलर पैनल लगाए गए,कितने चापाकल लगाए गए,और इन सभी कार्यों पर कितना सरकारी फंड खर्च हुआ।ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि दलमा क्षेत्र में इतना विकास किया जा रहा है, तो फिर दलमा सेंचुरी से हाथियों की झुंड पांच वर्षों से पलायन क्यों हो रहा है..? जंगल में वन्य जीव-जंतुओं और पक्षियों की संख्या लगातार कम क्यों हो रही है?
दलमा पहाड़ स्थित शिव मंदिर को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह स्थान सदियों से स्थानीय लोगों की आस्था और परंपरा का केंद्र रहा है, फिर भी गरीब ग्रामीणों से वहां जाने के लिए पैसा क्यों लिया जाता है।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि जब वन और वन्यजीवों के संरक्षण तथा पर्यटन के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा और निगरानी भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। इसलिए दलमा क्षेत्र में आधुनिक ट्रैकिंग कैमरे लगाए जाएं और हर महीने वन्य जीवों की उपस्थिति का आधिकारिक डेटा सार्वजनिक किया जाए, विशेष रूप से हाथियों के संबंध में, क्योंकि दलमा क्षेत्र गज परियोजना (Project Elephant) के अंतर्गत आता है।
अंत में दलमा क्षेत्र के ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा है कि वन विभाग अपने पूरे कार्यकाल में हुए सभी विकास कार्यों का पूरा हिसाब-किताब दलमा क्षेत्र के 135 गांवों की ग्राम सभा और ईको विकास समिति के सामने सार्वजनिक करे, अन्यथा “विकास” के नाम पर चल रहे कार्यक्रमों पर सवाल उठते रहेंगे। इस बैठक में मंगल मार्डी
,रविन्द्र सिंह ,राधेश्याम सिंह सरदार ,लाया भूषण पहाड़िया,जीतू पहाड़िया,मंगल पहाड़िया , सूर्य महोन सिंह सरदार आदि लोग उपस्थित थे।


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