हम रहे मस्ती में, आग लगे बस्ती में, विभाग की लापारवाही से ईचागढ़ वासी परेशान।

हम रहे मस्ती में, आग लगे बस्ती में, कहावत साबित हुए,विभाग की लापारवाही से ईचागढ़ वासी परेशान।

महुआ भट्ठियों के जावा से मस्त होकर गांव में घुस रहे हाथी, दलमा सेंचुरी से पलायन कर ईचागढ़ में डाला डेरा।

चांडिल,जहां-जहां अवैध देशी महुआ शराब की भट्ठियां संचालित होती हैं, उस क्षेत्र में हाथियों का झुंड नशे में धुत होकर गांव में प्रवेश कर जाता है और उत्पात मचाने लगता है। मानव और हाथी के बीच संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

8 साल से दलमा से पलायन कर रहे गजराज।

सामाजिक कार्यकर्ता सत्य नारायण मुर्मू ने बताया कि सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में एकमात्र सेंचुरी है जो दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी-गज परियोजना के नाम से जानी जाती है। दूर-दराज से पर्यटक यहां पहुंचते हैं, परंतु सेंचुरी से लगभग 8 वर्षों से गजराजों का पलायन जारी है।

हाथियों ने ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में डेरा डाल रखा है। शाम ढलते ही जंगल से हाथियों का झुंड भोजन, पानी और पौष्टिक आहार की तलाश में गांव में प्रवेश कर जाता है। घरों में रखे अनाज को निशाना बनाकर अपना निवाला बना लेता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि गरीब परिवार के लोग अगर सूखी लकड़ी जलावन के लिए घर लाते हैं तो वन विभाग के पदाधिकारी डराते-धमकाते हैं। वहीं देशी महुआ शराब भट्ठियों में प्रतिदिन कई टन लकड़ी शराब चुलाई के लिए आग के हवाले कर दी जाती है।

सत्य नारायण मुर्मू का कहना है कि भट्ठियों से निकलने वाले जावा यानी महुआ बनाने वाले अवशेष को खाकर हाथी मस्त हो जाते हैं और फिर गांवों का रुख करते हैं। जावा में रासायनिक प्रक्रिया से नशा पैदा होता है।

ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब भट्ठियों के लिए रोजाना पेड़ काटे जा रहे हैं और वन व पर्यावरण को क्षति पहुंचाई जा रही है, उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? इससे साफ जाहिर होता है कि प्रशासन, वन विभाग और उत्पाद विभाग की मिलीभगत से अवैध कारोबार चल रहा है।

बढ़ रहा मानव-हाथी संघर्ष:..? जंगल में भोजन-पानी की कमी और भट्ठियों के कारण हाथियों का प्राकृतिक व्यवहार बदल रहा है। यही वजह है कि ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में हाथी पलायन कर डेरा डाले हुए हैं और रोजाना मानव-हाथी संघर्ष की नौबत आ रही है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि जंगल की तराई में चल रही सभी अवैध महुआ भट्ठियों को तत्काल बंद कराया जाए और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो, ताकि हाथियों को उनके प्राकृतिक वास में ही भोजन-पानी मिल सके।

महुआ भट्ठियों के जावा से मस्त होकर गांव में घुस रहे हाथी, दलमा सेंचुरी से पलायन कर ईचागढ़ में डाला डेरा।

चांडिल,जहां-जहां अवैध देशी महुआ शराब की भट्ठियां संचालित होती हैं, उस क्षेत्र में हाथियों का झुंड नशे में धुत होकर गांव में प्रवेश कर जाता है और उत्पात मचाने लगता है। मानव और हाथी के बीच संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

8 साल से दलमा से पलायन कर रहे गजराज।

सामाजिक कार्यकर्ता सत्य नारायण मुर्मू ने बताया कि सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में एकमात्र सेंचुरी है जो दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी-गज परियोजना के नाम से जानी जाती है। दूर-दराज से पर्यटक यहां पहुंचते हैं, परंतु सेंचुरी से लगभग 8 वर्षों से गजराजों का पलायन जारी है।

हाथियों ने ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में डेरा डाल रखा है। शाम ढलते ही जंगल से हाथियों का झुंड भोजन, पानी और पौष्टिक आहार की तलाश में गांव में प्रवेश कर जाता है। घरों में रखे अनाज को निशाना बनाकर अपना निवाला बना लेता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि गरीब परिवार के लोग अगर सूखी लकड़ी जलावन के लिए घर लाते हैं तो वन विभाग के पदाधिकारी डराते-धमकाते हैं। वहीं देशी महुआ शराब भट्ठियों में प्रतिदिन कई टन लकड़ी शराब चुलाई के लिए आग के हवाले कर दी जाती है।

सत्य नारायण मुर्मू का कहना है कि भट्ठियों से निकलने वाले जावा यानी महुआ बनाने वाले अवशेष को खाकर हाथी मस्त हो जाते हैं और फिर गांवों का रुख करते हैं। जावा में रासायनिक प्रक्रिया से नशा पैदा होता है।

ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब भट्ठियों के लिए रोजाना पेड़ काटे जा रहे हैं और वन व पर्यावरण को क्षति पहुंचाई जा रही है, उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? इससे साफ जाहिर होता है कि प्रशासन, वन विभाग और उत्पाद विभाग की मिलीभगत से अवैध कारोबार चल रहा है।

बढ़ रहा मानव-हाथी संघर्ष:..? जंगल में भोजन-पानी की कमी और भट्ठियों के कारण हाथियों का प्राकृतिक व्यवहार बदल रहा है। यही वजह है कि ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में हाथी पलायन कर डेरा डाले हुए हैं और रोजाना मानव-हाथी संघर्ष की नौबत आ रही है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि जंगल की तराई में चल रही सभी अवैध महुआ भट्ठियों को तत्काल बंद कराया जाए और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो, ताकि हाथियों को उनके प्राकृतिक वास में ही भोजन-पानी मिल सके।क्ष



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