"भाई, उस दिन जो मेरे साथ हुआ... आज भी याद करता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।"
यार, मैं तुझे एक बात बताऊँ... शायद तू यकीन भी न करे। मैं भी पहले ऐसी कहानियों पर हँसता था। सोचता था कि ये सब फिल्मों में होता है, असल ज़िंदगी में नहीं। लेकिन जिस दिन ये सब मेरे साथ हुआ, उस दिन समझ आया कि ज़िंदगी किसी भी फिल्म से ज़्यादा अजीब हो सकती है।
ये बात लगभग दो साल पुरानी है। बारिश का मौसम था। शाम के करीब सात बज रहे थे। मैं ऑफिस से निकलकर घर जा रहा था। वैसे तो रोज़ का वही रास्ता था, लेकिन उस दिन न जाने क्यों मैंने सोचा कि चलो शॉर्टकट से चलते हैं। बस... यहीं से मेरी सबसे बड़ी गलती शुरू हुई।
वो रास्ता थोड़ा सुनसान था। दोनों तरफ बड़े-बड़े पेड़ थे और बीच में एक पतली सी सड़क। बारिश अभी-अभी रुकी थी, इसलिए चारों तरफ मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी। मैं आराम से बाइक चला रहा था। मोबाइल की बैटरी सिर्फ़ पाँच प्रतिशत बची थी, इसलिए गाने भी बंद कर दिए थे।
अचानक मेरी बाइक अपने आप बंद हो गई।
मैंने सोचा, शायद पेट्रोल खत्म हो गया होगा। लेकिन मीटर तो आधा टैंक दिखा रहा था। दो-तीन बार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन बिल्कुल आवाज़ ही नहीं कर रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसकी जान ही निकाल दी हो।
मैंने बाइक साइड में लगाई और इधर-उधर देखने लगा। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। तभी मुझे सड़क के दूसरी तरफ एक बहुत पुराना मकान दिखाई दिया। आधी टूटी हुई दीवारें, जंग लगा लोहे का गेट और अंदर बिल्कुल सन्नाटा।
मैंने सोचा, शायद वहाँ कोई रहता हो। अगर कोई मिल गया तो कम से कम फोन चार्ज करने या मदद माँगने का मौका मिल जाएगा।
जैसे ही मैं गेट के पास पहुँचा, बिना छुए ही गेट धीरे-धीरे "चीईई..." की आवाज़ के साथ अपने आप खुल गया।
उस पल मेरे कदम वहीं रुक गए।
दिल ने कहा, "वापस लौट जा।"
लेकिन दिमाग बोला, "डर मत, हवा से खुल गया होगा।"
मैं अंदर चला गया।
आँगन में एक बूढ़े अंकल चारपाई पर बैठे थे। सफेद दाढ़ी, पुराने कपड़े और चेहरे पर अजीब सी मुस्कान।
उन्होंने मुझे देखते ही कहा,
"आ गया बेटा? देर हो गई आज..."
मैं हैरान रह गया।
मैंने पूछा, "आप मुझे जानते हैं?"
वो मुस्कुराए और बोले,
"इतने सालों से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मैंने तो उन्हें पहली बार देखा था...
लेकिन उन्हें मेरा नाम भी पता था।
और जो उन्होंने उसके बाद कहा... उसने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी।
"भाई... उस रात मैं मौत के बिल्कुल सामने खड़ा था!"
भाई, मैं तुझे झूठ नहीं बोलूँगा। अगर ये बात किसी और से सुनता तो शायद मैं भी हँस देता। लेकिन ये सब मेरी आँखों के सामने हुआ था।
जहाँ पिछली बार छोड़ा था, वहीं से सुन।
जब उस बूढ़े अंकल ने कहा, "इतने सालों से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था," तो मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
मैंने डरते-डरते पूछा,
"अंकल... आप मुझे जानते हैं?"
उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले,
"तुझे तो नहीं... लेकिन तेरे आने का दिन मुझे बहुत पहले से पता था।"
मैं समझ ही नहीं पाया कि वो क्या कह रहे थे।
उन्होंने मुझे अंदर बैठने को कहा। कमरा बहुत पुराना था। दीवारों पर धूल जमी हुई थी, लेकिन एक चीज़ अजीब थी...
घर में बिजली नहीं थी, फिर भी एक लालटेन अपने आप जल रही थी।
मैंने सोचा शायद पहले से जलाई होगी।
अंकल ने मुझे चाय दी। मैं इतनी घबराया हुआ था कि मना भी नहीं कर पाया।
तभी उन्होंने पूछा,
"बेटा... तेरे पापा कैसे हैं?"
मैं एकदम चौंक गया।
मैंने तो उन्हें अपने बारे में कुछ बताया ही नहीं था।
मैंने पूछा,
"आपको कैसे पता कि मैं किसका बेटा हूँ?"
वो बस मुस्कुरा दिए।
फिर उठे, अलमारी खोली और एक पुराना डिब्बा निकालकर मेरे सामने रख दिया।
डिब्बा खुलते ही मेरी साँस अटक गई।
उसमें एक पुरानी फोटो थी।
फोटो में एक जवान आदमी था...
और उसके बिल्कुल बगल में वही बूढ़े अंकल खड़े थे।
लेकिन सबसे बड़ा झटका मुझे तब लगा...
जब उस जवान आदमी को मैंने ध्यान से देखा।
वो मेरे पापा थे।
करीब तीस साल पुराने।
मैंने काँपते हुए पूछा,
"ये... ये फोटो आपके पास कैसे आई?"
अंकल बोले,
"क्योंकि तीस साल पहले तेरे पापा भी इसी रास्ते से आए थे।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैंने उसी वक्त पापा को फोन मिलाया।
फोन नहीं लगा।
नेटवर्क गायब।
अंकल ने धीरे से कहा,
"यहाँ किसी का फोन नहीं चलता।"
मैं अब डर चुका था।
मैंने कहा,
"अंकल, मुझे जाना है।"
उन्होंने सिर्फ एक बात कही,
"जाना... लेकिन पीछे मुड़कर मत देखना।"
मुझे उनकी बात अजीब लगी।
मैं तेजी से बाहर निकला।
बाइक वहीं खड़ी थी।
इस बार एक किक में स्टार्ट भी हो गई।
मैंने राहत की साँस ली और तेज़ी से निकल पड़ा।
करीब पाँच मिनट बाद अचानक मुझे लगा कि पीछे कोई बैठा है।
बाइक थोड़ी भारी लगने लगी।
दिल की धड़कन तेज हो गई।
दिमाग बार-बार कह रहा था...
"पीछे मत देख..."
लेकिन इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी होती है—जिज्ञासा।
मैंने धीरे से शीशे में देखा...
पीछे कोई नहीं था।
मैंने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी...
कंधे पर किसी का ठंडा हाथ महसूस हुआ।
मैंने पूरी ताकत से एक्सेलरेटर घुमा दिया।
बाइक हवा की तरह दौड़ने लगी।
थोड़ी दूर जाकर अचानक शहर की लाइटें दिखने लगीं।
जैसे ही लोगों की भीड़ में पहुँचा...
कंधे का वो एहसास गायब हो गया।
मैं सीधे घर पहुँचा।
दरवाज़ा खोला।
पापा सोफे पर बैठे थे।
मुझे देखकर बोले,
"आज तू उस पुराने रास्ते से गया था?"
मैं हैरान रह गया।
मैंने पूछा,
"आपको कैसे पता?"
पापा कुछ देर चुप रहे।
फिर कमरे में गए।
पुरानी अलमारी खोली।
एक एल्बम निकाला।
उसी फोटो की दूसरी कॉपी मेरे सामने रख दी।
फिर उन्होंने कहा,
"आज समय आ गया है कि तुझे सच बता दूँ।"
उन्होंने बताया कि करीब तीस साल पहले वो भी उसी रास्ते से गुज़रे थे।
उनकी बाइक भी वहीं बंद हुई थी।
उन्हें भी वही बूढ़े अंकल मिले थे।
उन्होंने भी वही बातें कही थीं।
लेकिन जब अगले दिन पापा उन्हें धन्यवाद देने वापस गए...
तो वहाँ कोई घर था ही नहीं।
सिर्फ खंडहर।
गाँव वालों ने बताया...
उस घर का मालिक तो बीस साल पहले ही गुजर चुका था।
पापा ने तब से कभी उस रास्ते का नाम भी नहीं लिया।
उन्होंने सिर्फ एक बात कही—
"कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ विज्ञान के पास भी हर सवाल का जवाब नहीं होता।"
अगले दिन मैं फिर उस जगह गया।
दिन के उजाले में।
इस बार वहाँ सचमुच सिर्फ टूटी हुई दीवारें थीं।
न कोई चारपाई।
न कोई लालटेन।
न कोई बूढ़ा।
बस मिट्टी में आधी दबी हुई एक लकड़ी की तख्ती।
मैंने उसे उठाया।
उस पर धूल जमी थी।
साफ किया तो लिखा था—
"रघुनाथ निवास"
और नीचे एक तारीख...
1968 – 2002
यानी...
जिस आदमी से मैं पिछली रात मिला था...
उसकी मौत को चौबीस साल हो चुके थे।
मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
फिर चुपचाप वापस लौट आया।
आज भी जब उस सड़क का नाम सुनता हूँ, तो बाइक की रफ्तार अपने आप धीमी हो जाती है।
और आज तक मुझे ये समझ नहीं आया...
उस रात जिसने मेरी मदद की...
वो इंसान था...
या सिर्फ़ एक अधूरी कहानी, जो हर कुछ साल बाद किसी मुसाफ़िर का इंतज़ार करती है।
बस भाई...
ये थी मेरी कहानी।
अब तू चाहे यकीन कर, चाहे मत कर।
लेकिन अगर कभी बारिश की रात में कोई सुनसान रास्ता तुझे शॉर्टकट लगे...
तो मेरी एक बात याद रखना—
हर शॉर्टकट मंज़िल तक नहीं पहुँचाता... कुछ सीधे ऐसी कहानियों में ले जाते हैं जिन्हें इंसान पूरी ज़िंदगी भूल नहीं पाता।
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